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“बस्ती भाजपा में ‘नशे’ का बोलबाला? निष्ठावान कार्यकर्ता किनारे, तस्करों के हाथ में सत्ता का प्याला!”

"कमल के फूल पर 'स्मैक' के छींटे! संगठन के आकाओं ने अपनों को ठगा, अपराधियों को माथे पर बिठाया!"

​अजीत मिश्रा (खोजी)

‘सिस्टम’ के संरक्षण में ‘स्मैक’ का खेल? भाजपा की साख पर भारी पड़ते ‘दागी’ पार्षद!

“तस्करों को ‘माननीय’ बनाने का खेल: हरीश, विवेकानंद और वरुण की चौकड़ी पर उठे गंभीर सवाल!”

बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश।

बस्ती। राजनीति में जब निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर संदिग्ध छवि वाले लोगों को ‘माननीय’ बनाया जाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि पार्टी का पतन निकट है। जनपद में हाल ही में हुए मनोनीत सभासदों की सूची ने न केवल भाजपा के भीतर के अंतर्विरोधों को उजागर किया है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

​आभार का ‘अजीब’ गणित

​सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा एक ‘धन्यवाद’ संदेश आज चर्चा का विषय बना हुआ है। एक मनोनीत सभासद द्वारा पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी, जिलाध्यक्ष विवेकानंद मिश्र और वरुण सिंह का आभार जताना, लेकिन स्थानीय विधायक अजय सिंह को पूरी तरह नजरअंदाज कर देना, किसी गहरी साजिश या गुटबाजी की ओर इशारा करता है। आखिर विधायक का आभार क्यों नहीं? क्या इसलिए क्योंकि विधायक जी ने एक ‘दागी’ और कथित ‘तस्कर’ के मनोनयन का विरोध किया था?

​कार्यकर्ता की हत्या, अपराधियों का सत्कार!

​ जो व्यक्ति कभी सामाजिक सम्मान के लायक नहीं था, उसे भाजपा के दिग्गज नेताओं ने रातों-रात ‘इज्जतदार’ बना दिया।

    • सवाल यह है: क्या पार्टी के पास जमीन पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं का अकाल पड़ गया था?
    • ​क्या अब ‘गांजा और स्मैक तस्करों’ के दम पर संगठन की वैतरणी पार की जाएगी?

“जिस पुलिस ने कल तक इन अपराधियों को गलियों में खदेड़ा, आज सत्ता के दबाव में वही पुलिस इन्हें सैल्यूट ठोकने को मजबूर है। यह समाज और लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।”

 

​विकास या विनाश?

​नगर पंचायत बोर्ड की बैठकों में जब कथित तस्करों की मौजूदगी होगी, तो वहाँ विकास की नहीं, बल्कि अवैध धंधों के संरक्षण की रणनीति बनेगी। जनता चिल्लाती रहेगी, लेकिन सुनवाई सिर्फ उनकी होगी जो नशे के कारोबार में लिप्त हैं। नेताओं की यह ‘अपराधी प्रेम’ वाली नीति आगामी चुनावों में पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है।

​सत्ता के गलियारों में सन्नाटा

​जनता पूछ रही है कि आखिर वरुण सिंह और संगठन के अन्य कर्णधारों की इन संदिग्धों के मनोनयन में क्या भूमिका है? क्या भाजपा के दामन पर पड़ रहे ये छींटे नेताओं को नजर नहीं आ रहे? अगर यही संरक्षण असली कार्यकर्ताओं को मिलता, तो शायद आज पार्टी की स्थिति कुछ और होती।

अपराधियों का ‘राज्याभिषेक’ और नैतिकता का जनाजा बस्ती जनपद की राजनीति में यह काला अध्याय है कि जो कल तक पुलिस की फाइलों में ‘दागी’ थे, आज वे भगवा अंगवस्त्र पहनकर ‘सिस्टम’ चला रहे हैं। वरुण सिंह और विवेकानंद मिश्र जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग आखिर किस मजबूरी में एक कथित तस्कर के लिए पैरवी कर रहे थे? क्या पार्टी का कैडर इतना खोखला हो चुका है कि उसे ‘गांजा और स्मैक’ बेचने वालों में भविष्य नजर आ रहा है?

विधायक अजय सिंह की उपेक्षा या अपराधियों की चिढ़? सूत्रों की मानें तो स्थानीय विधायक अजय सिंह ने इस मनोनयन का कड़ा विरोध किया था। शायद यही कारण है कि ‘उपकृत’ हुए सभासद ने अपने आभार पत्र से विधायक का नाम गायब कर दिया। यह सीधे तौर पर संदेश है कि अब संगठन में ‘सफेदपोश अपराधियों’ का वर्चस्व है और वे उन नेताओं को अपना दुश्मन मानते हैं जो शुचिता की बात करते हैं।

जनता की अदालत में ‘गुटबाजी’ का हिसाब पार्टी के भीतर मचे इस घमासान ने जनता के बीच भाजपा की छवि को धूलधूसरित कर दिया है। जब नगर पंचायत बोर्ड की बैठकों में विकास की जगह ‘नशे की खेप’ पर चर्चा होने की आशंका हो, तो आम आदमी खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। नेताओं को यह गलतफहमी पालना भारी पड़ेगा कि जनता अंधी है; लोकसभा चुनाव के परिणामों ने जो संकेत दिए थे, लगता है बस्ती के इन ‘बड़े भाई’ और ‘आकाओं’ ने उससे कोई सबक नहीं सीखा।

निष्कर्ष: यदि समय रहते ‘गंदगी’ साफ नहीं की गई, तो जनता का आक्रोश और कार्यकर्ताओं की बेबसी आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाएगी। अब देखना यह है कि शीर्ष नेतृत्व इस ‘नशे के कारोबार’ और ‘राजनीति के गठजोड़’ पर क्या रुख अपनाता है।

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